Delhi Riots Larger Conspiracy Case: सुप्रीम कोर्ट में आरोपियों और दिल्ली पुलिस के बीच तीखी बहस

दिल्ली दंगों के लार्जर कंस्पिरेसी केस में सुप्रीम कोर्ट के सामने आरोपियों और दिल्ली पुलिस की दलीलें पेश, फैसला 5 जनवरी को आएगा।

Jan 4, 2026 - 21:24
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Delhi Riots Larger Conspiracy Case: सुप्रीम कोर्ट में आरोपियों और दिल्ली पुलिस के बीच तीखी बहस

दिल्ली दंगों से जुड़े कथित “लार्जर कंस्पिरेसी केस” को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान आरोपियों और दिल्ली पुलिस के बीच तीखी बहस देखने को मिली। जहां आरोपियों की ओर से जांच में देरी, लंबे समय तक जेल में बंद रहने और पुख्ता सबूतों की कमी का मुद्दा उठाया गया, वहीं दिल्ली पुलिस ने इस पूरे मामले को देश को अस्थिर करने की एक सोची-समझी साजिश करार दिया।

इस हाई-प्रोफाइल मामले में सुप्रीम कोर्ट दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद 5 जनवरी को अपना फैसला सुनाएगा

जांच और ट्रायल में देरी का आरोप

आरोपियों के वकीलों ने कोर्ट को बताया कि एफआईआर दर्ज होने के बावजूद ट्रायल शुरू होने में वर्षों की देरी हुई। इस दौरान आरोपी लंबे समय से जेल में बंद रहे। बचाव पक्ष का आरोप है कि दिल्ली पुलिस बार-बार सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल करती रही, जिससे ट्रायल टलता रहा और मामला अनिश्चितकाल तक लटका रहा।

उमर खालिद को लेकर क्या कहा गया?

उमर खालिद के बचाव पक्ष ने दलील दी कि दंगों के समय वह दिल्ली में मौजूद ही नहीं थे। उनके खिलाफ न तो किसी हथियार का सबूत है, न कोई प्रत्यक्षदर्शी और न ही हिंसा भड़काने का कोई ठोस प्रमाण।

वकीलों ने कहा कि अभियोजन का पूरा मामला 17 फरवरी 2020 को अमरावती टीवी पर दिए गए एक भाषण पर आधारित है, जिसमें कहीं भी हिंसा के लिए उकसाने की बात नहीं कही गई। मार्च 2020 में एफआईआर दर्ज हुई, लेकिन जून 2023 तक सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल होती रहीं, जिससे तीन साल से अधिक समय तक ट्रायल शुरू नहीं हो सका।

शरजील इमाम के मामले में क्या तर्क दिए गए?

शरजील इमाम के पक्ष में कहा गया कि वह अगस्त 2020 से जेल में हैं, जबकि जांच को 2024 में पूरा बताया गया। उनके खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध के समर्थन में दिए गए भाषण के अलावा कोई ठोस आरोप नहीं है। बचाव पक्ष ने दलील दी कि असहमति और विरोध को अपराध नहीं माना जा सकता

शिफा उर रहमान पर लगे आरोप

शिफा उर रहमान के मामले में कहा गया कि न तो उनकी कोई संगठनात्मक भूमिका थी, न उन्होंने कोई भड़काऊ भाषण दिया और न ही किसी हिंसक गतिविधि में हिस्सा लिया। उनके खिलाफ मौजूद कुछ डिजिटल सबूत और दो बयान यूएपीए जैसे कड़े कानून के तहत अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

दिल्ली पुलिस की दलील

दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि यह हिंसा अचानक नहीं हुई, बल्कि यह एक पूर्व-नियोजित और सुनियोजित साजिश का हिस्सा थी। पुलिस के मुताबिक, यह तथाकथित “रेजीम चेंज ऑपरेशन” था, जिसका उद्देश्य भारत को अस्थिर करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि को नुकसान पहुंचाना था।

पुलिस ने दावा किया कि यह हिंसा जानबूझकर उस समय कराई गई जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत दौरे पर थे, ताकि वैश्विक ध्यान आकर्षित किया जा सके। साथ ही, नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को जानबूझकर एक भड़काऊ मुद्दे के रूप में चुना गया और उसे शांतिपूर्ण आंदोलन की आड़ में आगे बढ़ाया गया।

दिल्ली पुलिस का कहना है कि गवाहों के बयान, दस्तावेजी और तकनीकी सबूत आरोपियों को इस कथित बड़ी साजिश से जोड़ते हैं। पुलिस ने यह भी कहा कि ट्रायल में हुई देरी के लिए आरोपी स्वयं जिम्मेदार हैं।

अब सुप्रीम कोर्ट सभी दलीलों और रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों के आधार पर मामले पर विचार कर रहा है।

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