ट्रंप का पाकिस्तान पर क्रिटिकल मिनरल्स दांव क्यों पड़ सकता है उल्टा? असीम मुनीर और सुरक्षा संकट

ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान के आर्मी चीफ असीम मुनीर पर भरोसा जताया, लेकिन बढ़ती उग्रवादी हिंसा और अमेरिकी हथियारों के आतंकियों तक पहुंचने से यह साझेदारी खतरे में. पूरा विश्लेषण पढ़ें.

Feb 9, 2026 - 19:18
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ट्रंप का पाकिस्तान पर क्रिटिकल मिनरल्स दांव क्यों पड़ सकता है उल्टा? असीम मुनीर और सुरक्षा संकट

ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल (फील्ड मार्शल) असीम मुनीर पर महत्वपूर्ण खनिजों को लेकर भरोसा जताया था, लेकिन अब कई विश्लेषकों का मानना है कि यह रणनीति विफल साबित हो सकती है. पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता, बढ़ती उग्रवादी गतिविधियां और अमेरिकी हथियारों का आतंकवादी संगठनों के हाथों में पहुंचना इस साझेदारी के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है.

मुनीर ने ट्रंप को क्रिटिकल मिनरल्स का प्रस्ताव दिया

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने अमेरिका को बड़े पैमाने पर खनिज भंडार का ऑफर दिया है, क्योंकि ट्रंप प्रशासन चीन पर निर्भरता कम करने के लिए कॉपर, लिथियम, कोबाल्ट, सोना और रेयर अर्थ जैसे महत्वपूर्ण खनिजों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है.

इस रणनीति का केंद्र रेको डिक (Reko Diq) परियोजना है, जो बलूचिस्तान में स्थित है और दुनिया के सबसे बड़े अप्रयुक्त कॉपर-गोल्ड भंडारों में से एक माना जाता है. इस परियोजना में:

  • कनाडाई कंपनी बैरिक गोल्ड की 50% हिस्सेदारी है.

  • पाकिस्तान सरकार की 25% और बलूचिस्तान सरकार की 25% हिस्सेदारी है.

  • दिसंबर 2025 में अमेरिकी एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट बैंक ने 1.25 अरब डॉलर की फंडिंग मंजूर की थी.

  • पाकिस्तान का दावा है कि उसके पास कुल 8 ट्रिलियन डॉलर तक के खनिज भंडार हैं.

सितंबर 2025 में प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और जनरल मुनीर ने व्हाइट हाउस में ट्रंप को रेयर अर्थ मिनरल्स का नमूना दिखाया था. इस दौरान ट्रंप ने मुनीर को मजाकिया अंदाज में “माय फेवरेट फील्ड मार्शल” कहा था.

अमेरिका के लिए क्रिटिकल मिनरल्स क्यों अहम?

दुनिया में 90% से अधिक रेयर अर्थ प्रोसेसिंग चीन के नियंत्रण में है. इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और ग्रीन एनर्जी के विस्तार के कारण 2050 तक कॉपर की मांग दोगुनी होने का अनुमान है. इसी वजह से अमेरिका वैकल्पिक सप्लाई चेन बनाना चाहता है.

क्यों ट्रंप का दांव उल्टा पड़ सकता है?

पाकिस्तान के अधिकांश खनिज भंडार बलूचिस्तान और अफगान सीमा से लगे इलाकों में हैं, जहां सुरक्षा स्थिति लगातार बिगड़ रही है. इस साझेदारी के विफल होने के पांच बड़े कारण बताए जा रहे हैं:

1. अत्याधुनिक हथियारों से लैस उग्रवादी

2021 में अमेरिका की अफगानिस्तान से वापसी के बाद छोड़े गए हथियार अब पाकिस्तान के खिलाफ इस्तेमाल हो रहे हैं. M-16, M-4, M249 मशीन गन, स्नाइपर राइफल और नाइट विजन डिवाइस जैसे हथियार TTP, BLA और ISKP जैसे संगठनों के पास पहुंच चुके हैं.

CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के सीमा क्षेत्रों में ऐसे 100 से अधिक हथियार मिले हैं, जिनके सीरियल नंबर बताते हैं कि ये पहले अफगान सेना को दिए गए थे. अब आतंकवादी IED की जगह लंबी दूरी की फायरिंग और रात में हमले कर रहे हैं.

2. बलूचिस्तान में बढ़ती हिंसा

जनवरी 2026 में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) ने समन्वित हमले किए, जिनमें 33 से ज्यादा लोग मारे गए. पाकिस्तान ने जवाब में “ऑपरेशन रद्द-उल-फितना-1” शुरू किया और 216 आतंकवादियों को मार गिराने का दावा किया, लेकिन इसमें 36 नागरिक और 22 सुरक्षाकर्मी भी मारे गए.

2025 बलूचिस्तान के लिए सबसे घातक साल रहा, जिसमें 254 से अधिक हमले हुए और 400 से ज्यादा लोग मारे गए. अब उग्रवादी ट्रेन हाईजैक, हाईवे ब्लॉक और इलाकों पर कब्जा कर रहे हैं.

3. रेको डिक परियोजना पर खतरा

बैरिक गोल्ड के CEO मार्क हिल ने फरवरी 2026 में कहा कि कंपनी परियोजना की पूरी समीक्षा कर रही है. निवेशकों को डर है कि यह प्रोजेक्ट 2028 तक भी शुरू हो पाएगा या नहीं.

4. अफगानिस्तान का प्रभाव

तालिबान के पास अमेरिकी हथियारों का बड़ा भंडार है और पाकिस्तान उन पर आतंकवादियों को शरण देने का आरोप लगाता है. ट्रंप प्रशासन ने हथियार वापस मांगे, लेकिन अब तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है.

5. मुनीर के कार्यकाल में बढ़ते हमले

6 फरवरी 2026 को इस्लामाबाद के तरलाई कलां इलाके में खदीजा तुल कुबरा शिया मस्जिद में आत्मघाती हमला हुआ, जिसमें 31-32 लोग मारे गए और 160 से ज्यादा घायल हुए. इस्लामिक स्टेट (ISIS) ने जिम्मेदारी ली. इससे पहले नवंबर 2025 में कोर्ट के बाहर हुए हमले में 12 लोगों की मौत हुई थी.

इन घटनाओं से साफ है कि राजधानी इस्लामाबाद भी सुरक्षित नहीं है, जबकि सरकार और सेना सुरक्षा के बड़े दावे करती रही है.

आगे क्या होगा?

पाकिस्तान अब तक IMF से 24 बार आर्थिक मदद ले चुका है. खनिज क्षेत्र को देश की आर्थिक रिकवरी का बड़ा आधार माना जा रहा है, लेकिन जब तक स्थानीय लोगों को लाभ नहीं मिलेगा और राजनीतिक स्थिरता नहीं होगी, तब तक ये परियोजनाएं जोखिम में रहेंगी.

अमेरिका की चीन-विरोधी रणनीति में पाकिस्तान एक विकल्प था, लेकिन बढ़ते सुरक्षा खतरे इसे कमजोर बना रहे हैं. पाकिस्तान अभी भी चीन के साथ CPEC और “ऑल-वेदर फ्रेंडशिप” बनाए हुए है, जिससे वह दोहरी नीति अपनाता दिख रहा है.

विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक संवाद, विकास और सत्ता-साझेदारी नहीं होगी, तब तक ये खनिज भंडार जमीन में ही दबे रह सकते हैं.

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