एप्सटीन फाइल्स की गूंज से ‘इंडियन एप्सटीन’ तक: कुलदीप सिंह सेंगर की जमानत पर सुप्रीम कोर्ट की रोक
एप्सटीन फाइल्स की वैश्विक चर्चा के बीच भारत में कुलदीप सिंह सेंगर का मामला फिर सुर्खियों में है। नाबालिग से रेप के दोषी सेंगर को दिल्ली हाईकोर्ट से मिली जमानत पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। जानिए पूरा मामला, कोर्ट की दलीलें और पीड़ित परिवार की प्रतिक्रिया।
एक मृत व्यक्ति की फाइलों ने दुनिया भर के कई ताकतवर और रसूखदार लोगों की नींद उड़ा दी है। डर इस बात का है कि किसी भी पन्ने पर कब किसका नाम या तस्वीर सामने आ जाए। कुख्यात एप्सटीन फाइल्स में ऐसे ही कई अमीर, प्रभावशाली और मशहूर लोगों के नाम जोड़े गए हैं, जिनका संबंध उस व्यक्ति से बताया गया है जिस पर नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण के गंभीर आरोप थे। सोमवार को इसी एप्सटीन फाइल्स का संदर्भ भारत की सर्वोच्च अदालत, सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया।
असल में, सजायाफ्ता अपराधी कुलदीप सिंह सेंगर का अमेरिका या एप्सटीन से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं रहा। न ही वह कभी अमेरिका गया और न ही उसकी कोई तस्वीर एप्सटीन फाइल्स में होने की बात सामने आई। लेकिन साल 2017 में उत्तर प्रदेश में विधायक रहते हुए एक नाबालिग से रेप के मामले में उसकी भूमिका के कारण सुप्रीम कोर्ट में उसे “इंडियन एप्सटीन गैंग” का सदस्य या सरगना कहकर संबोधित किया गया।
बीते कुछ दिनों से दिल्ली हाईकोर्ट का एक फैसला चर्चा में था, जिसने आम लोगों से लेकर कानूनी विशेषज्ञों तक को हैरान कर दिया था। सवाल यह था कि उम्रकैद की सजा पाए एक रेपिस्ट को जमानत कैसे दी जा सकती है। शायद इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को हस्तक्षेप करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें कुलदीप सिंह सेंगर को जमानत दी गई थी। अब सेंगर की जेल से रिहाई फिलहाल संभव नहीं है।
दरअसल, 23 दिसंबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने यह कहते हुए सेंगर को जमानत दी थी कि वह 7 साल 6 महीने की सजा काट चुका है और जिस पॉक्सो एक्ट के तहत उसे उम्रकैद मिली थी, वह तभी लागू होता है जब आरोपी पब्लिक सर्वेंट हो। हाईकोर्ट की राय में सेंगर पब्लिक सर्वेंट नहीं था।
इस फैसले को चुनौती देते हुए सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सीबीआई का तर्क था कि 2017 में जब अपराध हुआ, उस समय सेंगर सत्ताधारी पार्टी का विधायक था और विधायक या सांसद कानूनन पब्लिक सर्वेंट की श्रेणी में आते हैं। इसी आधार पर पॉक्सो एक्ट की कड़ी धाराएं उस पर लागू होती हैं।
पॉक्सो कानून में यह स्पष्ट प्रावधान है कि यदि कोई पुलिसकर्मी, अर्धसैनिक बल का सदस्य, सरकारी कर्मचारी, शिक्षक, अस्पताल स्टाफ या कोई अन्य सार्वजनिक पद पर बैठा व्यक्ति नाबालिग के साथ यौन अपराध करता है, तो उसे अधिक कठोर सजा दी जाएगी। सीबीआई की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि पॉक्सो एक्ट का उद्देश्य केवल सजा देना नहीं, बल्कि बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी है।
सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की दलीलों से सहमति जताते हुए कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट ने कानून की व्याख्या में गलती की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सामान्य मामलों में नाबालिग से रेप पर कम से कम 7 साल और अधिकतम उम्रकैद की सजा है, लेकिन यदि आरोपी पब्लिक सर्वेंट हो तो न्यूनतम सजा 20 साल से लेकर उम्रकैद तक हो सकती है।
दिल्ली हाईकोर्ट में सेंगर के वकील ने यह तर्क दिया था कि उनका मुवक्किल पब्लिक सर्वेंट नहीं है, इसलिए उसे न्यूनतम सजा का लाभ मिलना चाहिए। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने जमानत दी थी। जबकि 2019 में पटियाला हाउस कोर्ट ने सेंगर को पब्लिक सर्वेंट मानते हुए ही उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
अब सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले पर रोक लगाते हुए साफ कर दिया है कि सेंगर फिलहाल जेल में ही रहेगा। तीन जजों की वेकेशन बेंच—जिसमें चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जे.के. महेश्वरी और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल थे—ने मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि चूंकि सेंगर पहले से ही एक अन्य मामले में सजा काट रहा है, इसलिए जमानत पर रोक से उसकी तत्काल रिहाई का सवाल ही नहीं उठता।
सुप्रीम कोर्ट ने सेंगर को चार हफ्तों के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। फैसले के बाद पीड़िता की मां और बहन ने अदालत का आभार जताया, लेकिन साथ ही अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता भी व्यक्त की। फिलहाल, नए साल में कुलदीप सिंह सेंगर की रिहाई की उम्मीदें खत्म होती नजर आ रही हैं, और यह मामला एक बार फिर न्याय व्यवस्था और पीड़ितों की सुरक्षा पर बहस का केंद्र बन गया है।
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