प्राइवेट अस्पतालों की लूट: इलाज के नाम पर करोड़ों की वसूली और अमानवीय सच

लखनऊ से मुंगेर और ग्रेटर नोएडा तक प्राइवेट अस्पतालों की कथित लापरवाही और मुनाफाखोरी की चौंकाने वाली कहानियां। इलाज बना कमाई का जरिया।

Jan 14, 2026 - 00:09
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प्राइवेट अस्पतालों की लूट: इलाज के नाम पर करोड़ों की वसूली और अमानवीय सच

सफेद कोट, आधुनिक मशीनें और चमचमाती इमारतें—इन सबके पीछे प्राइवेट अस्पतालों का एक ऐसा चेहरा छिपा है, जो इंसानियत को कटघरे में खड़ा करता है। ‘आजतक’ की पड़ताल में उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार और मध्य प्रदेश तक, प्राइवेट अस्पतालों की कथित मुनाफाखोरी, लापरवाही और अमानवीय रवैये की कई चौंकाने वाली कहानियां सामने आई हैं।

शहर अलग हैं, मरीज अलग हैं, लेकिन पीड़ा की कहानी एक जैसी है—इलाज के नाम पर बेहिसाब पैसे, संदिग्ध मेडिकल फैसले और न्याय के लिए भटकते परिवार। लखनऊ, ग्रेटर नोएडा, मुंगेर, रांची और भोपाल से आई ग्राउंड रिपोर्ट्स यही सवाल उठाती हैं कि आखिर मरीजों की मजबूरी को कारोबार कब तक बनाया जाता रहेगा?

लखनऊ: एक हादसा, जिसने जिंदगीभर की अपंगता दे दी

लखनऊ के 35 वर्षीय नीरज मिश्रा की कहानी कथित मेडिकल लापरवाही की भयावह मिसाल है। तीन साल पहले बैटरी रिक्शा दुर्घटना में घायल नीरज इलाज के लिए विनोद हॉस्पिटल पहुंचे। आरोप है कि वहां गलत सर्जरी के बाद उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई। इलाज के नाम पर बार-बार पैसे जमा कराए गए और एक दूसरे अस्पताल में इलाज दिखाकर रकम विनोद हॉस्पिटल में ही वसूली गई।

बताया जाता है कि उन्हें रातों-रात दोबारा उसी अस्पताल लाया गया, जहां जल्दबाजी में टांके ठीक से नहीं लगाए गए। इसके बाद उन्हें एक अन्य प्राइवेट अस्पताल में 9 से 10 सर्जरी करानी पड़ीं। एक पैर खराब होने पर दूसरे पैर से मांस प्रत्यारोपण किया गया, जिससे दोनों पैर कमजोर हो गए और नीरज चलने-फिरने में असमर्थ हो गए।

इलाज के इस लंबे सिलसिले में नीरज पर करीब 21 लाख रुपये का कर्ज चढ़ गया। उन्होंने उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक, सीएमओ, प्रमुख सचिव स्वास्थ्य और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत कई अधिकारियों को 13 से ज्यादा शिकायतें भेजीं, लेकिन लंबे समय तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

हालांकि, परिवार कल्याण बोर्ड की जांच रिपोर्ट में विनोद हॉस्पिटल को ऑपरेशन के दौरान हुई जटिलताओं का जिम्मेदार माना गया। इसके बाद सीएमओ ने अस्पताल का रजिस्ट्रेशन रद्द कर सभी चिकित्सा गतिविधियों पर रोक लगा दी। अस्पताल संचालक विनोद मिश्रा ने आरोपों को निराधार बताया है।

ग्रेटर नोएडा: 30 लाख लेने के बाद भी शव रोकने का आरोप

ग्रेटर नोएडा के महानंदन हॉस्पिटल में फिरोजाबाद निवासी जयदेव सिंह का मामला इंसानियत को झकझोर देने वाला है। ब्रेन हैमरेज के बाद इलाज के लिए परिवार से करीब 30 लाख रुपये वसूले गए। जमीन तक बेच दी गई, कर्ज ले लिया गया, लेकिन मरीज की जान नहीं बच सकी।

7 जनवरी को जयदेव सिंह की मौत के बाद अस्पताल ने करीब 3 लाख रुपये बकाया होने का हवाला देते हुए शव देने से इनकार कर दिया। परिजनों का आरोप है कि इलाज के दौरान उन्हें मरीज की हालत और खर्च को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। हर कुछ दिन में भुगतान किया जाता रहा, लेकिन अचानक मरीज की हालत बिगड़ी और शाम को मौत घोषित कर दी गई।

पैसे न होने के कारण शव रोके जाने से परेशान परिवार ने पुलिस को सूचना दी। करीब 6–7 घंटे के पुलिस हस्तक्षेप के बाद अस्पताल ने शव सौंपा। अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि परिवार को खर्च की जानकारी पहले से दी जा चुकी थी।

मुंगेर: बिना अनुमति पैर काटा, परिवार को बनाया बंधक

बिहार के मुंगेर में साइकिल पर बर्तन बेचने वाले टिंकू साहू के साथ जो हुआ, वह किसी बुरे सपने से कम नहीं। सड़क दुर्घटना के बाद उन्हें सदर अस्पताल से नेशनल हॉस्पिटल ले जाया गया। आरोप है कि परिजनों की सहमति के बिना आधी रात उनका दाहिना पैर काट दिया गया।

24 नवंबर 2025 को घायल हुए टिंकू साहू को पटना रेफर करने की बात कहकर एंबुलेंस से सीधे प्राइवेट अस्पताल ले जाया गया। वहां इलाज के नाम पर करीब 4 लाख रुपये वसूले गए। आरोप है कि पैसे न देने पर उनकी मां और पत्नी को करीब 13 दिन तक अस्पताल में बंधक बनाकर रखा गया।

परिवार का दावा है कि पिता से कहा गया—“किडनी बेचो या शरीर बेचो, पैसा लाओगे तभी बेटा और बहू छूटेंगे।”
2 दिसंबर 2025 को डीएम से शिकायत के बाद प्रशासन ने हस्तक्षेप किया, टिंकू को मुक्त कराया गया और सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया। प्रशासन ने अस्पताल को नोटिस जारी कर पंजीकरण रद्द करने की चेतावनी दी है।

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